BJP के लिए कितना बड़ा झटका, कांग्रेस को मिलेगा क्या फायदा

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हाथरस की घटना को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने जिस तरह से हाथों-हाथ लिया है, उससे यह सियासी बहस छिड़ गई है कि क्या इससे उत्तर प्रदेश में मृत पड़े कांग्रेस संगठन में जान आ जाएगी

या फिर इसका भी अंजाम भट्टा-पारसौल या फिर दादरी कांड की तरह कुछ दिनों के लिए लाइट-कैमरा और ऐक्शन तक ही सीमित होकर रह जाना है। इससे भी बड़ा सवाल उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर है

कि भगवा राजनीति के लिए यह तात्कालिक नुकसान साबित होना है या इससे उसे लंबे समय के लिए चोट पहुंच सकती है। खासकर बात वाल्मीकि समाज को लेकर हो रही है कि दोनों भाई-बहनों ने जिस तरह से उन्हें गोलबंद करने की कोशिश की है, उसका फायदा

2022 के विधानसभा चुनाव में मिलना भी है या फिर सिर्फ गांधी परिवार के ‘बच्चों’ को देखने के मकसद से जुटी भीड़ को देखकर ही गदगद होकर रह जाना है। क्योंकि ये तथ्य है कि गांधी-नेहरू परिवार के बच्चों की एक झलक देखने भर के लिए

आज भी भारतीय समाज के बड़े तबके में बहुत ही ज्यादा उत्सुकता रहती है।हाथरस की घटना को लेकर चर्चा में आने के बाद कांग्रेस ने माहौल गर्म रखने के लिए पहला गंभीर प्रयास ये किया है कि उसने नेताओं से सोमवार को जिला और प्रदेश कार्यालयों में सत्याग्रह करने को कहा है।

असल में ‘ग्रुप ऑफ 23’ के झटके से उबरने के लिए भी कांग्रेस की यह कोशिश है कि यह संदेश भी दिया जाए कि सोनिया गांधी के दोनों बच्चे सिर्फ कैमरे की राजनीति के लिए ही नहीं, सड़कों की राजनीति के लिए भी तैयार हो चुके हैं।

इस मामले में पार्टी जरूर अपनी पीठ थपथपा सकती है कि हाथरस जाने के लिए दोनों दो दिन तक लगे रहे और आखिरकार उन्हें पीड़ित परिवार से मुलाकात का भी मौका मिल गया।

लेकिन, उत्तर प्रदेश जैसे पॉलिटिकली चार्ज राज्य में यह तो शुरुआत है। क्योंकि, यहां का समाज जातियों के ताने-बाने में इस कदर उलझा हुआ है कि सियासी धारा को एक समान बनाए रखना भी ‘बच्चों का खेल’ नहीं है।